श्री अयोध्या जैन तीर्थ क्षेत्र समिति
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अयोध्या जैन तीर्थ लोगो

अयोध्या का धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व एवं तीर्थ परिचय

अयोध्या जैन तीर्थ प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र है।

अयोध्या जैन तीर्थ मुख्य जिनालय

अयोध्या का धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व

  1. अयोध्या अनंतानंत तीर्थंकरों की जन्मभूमि है, प्रत्येक काल में सभी 24 तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में ही होता है।
  2. अयोध्या को शाश्वत तीर्थ कहा गया है।
  3. अयोध्या की रचना इन्द्रों द्वारा की गई है।
  4. "अरिभिः योद्धं न शक्या अयोध्या" अर्थात् कोई भी शत्रु, जिसे जीत न सके, उसे अयोध्या कहते हैं।
  5. अयोध्या के साकेता, विनीता, सुकोशला जैसे नाम भी शास्त्रोल्लेखित हैं।
  6. अयोध्या में इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव सहित 5 तीर्थंकर जन्मे हैं। भगवान ऋषभदेव करोड़ों-करोड़ वर्ष पूर्व हुए हैं।
  7. अयोध्या में अनंतों बार तीर्थंकरों के जन्म अवसरों पर सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से धनकुबेर ने करोड़ों-करोड़ों रत्नों की वर्षा की है अतः यह रत्नगर्भा तीर्थभूमि कहलाती है।
  8. अयोध्या में ही इस युग के प्रथम राजा भगवान ऋषभदेव हुए हैं, जिन्होंने इस धरती पर शिक्षा का सूत्रपात किया।
  9. अयोध्या से ही असि (शस्त्र विद्या), मसि (लेखन विद्या), कृषि (खेती), विद्या (अध्ययन-अध्यापन), वाणिज्य (व्यापार) और शिल्प (कला) जैसी षट्क्रियाएँ भगवान ऋषभदेव द्वारा जीवन जीने के लिए सिखाई गई हैं।
  10. अयोध्या में ही भगवान ऋषभदेव ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को अ, आ आदि अक्षर लिपि सिखाई, जो आज भी ब्राह्मी लिपि के नाम से सुप्रसिद्ध है और सुन्दरी पुत्री को 1, 2 आदि अंकलिपि सिखाई, जो आज भी गणित विद्या के रूप में विकसित है।
  11. अयोध्या ही भगवान ऋषभदेव के प्रथम पुत्र भगवान भरत चक्रवर्ती का जन्मस्थान है। इन्हीं 'भरत' के नाम से इस देश का नाम 'भारत' है।
  12. अयोध्या से ही इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि हुई है। भरत के प्रथम पुत्र अर्ककीर्ति के नाम से इस इक्ष्वाकुवंश को सूर्यवंश की संज्ञा प्राप्त हुई। ऋषभदेव भगवान के द्वितीय पुत्र बाहुबली के पुत्र सोमयश के नाम से चन्द्रवंश प्रसिद्ध हुआ। अतः अयोध्या से सूर्यवंश और चन्द्रवंश दोनों ही इक्ष्वाकुवंश की शाखाएँ प्रसिद्ध हुई हैं।
  13. अयोध्या में ऋषभदेव भगवान के उपरांत इनके पुत्र भरत से शुभारंभ करके 14 लाख इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं ने लगातार राज्य करने के उपरांत दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया है और भगवान ऋषभदेव के समस्त 101 पुत्र भी तपस्या करके मोक्ष गये हैं।
  14. अयोध्या भगवान ऋषभदेव के अलावा भगवान अजितनाथ, भगवान अभिनंदननाथ, भगवान सुमतिनाथ और भगवान अनंतनाथ का भी जन्मस्थान है।
  15. अयोध्या में युग की आदि में 81 खण्ड (मंजिल) का "सर्वतोभद्र राजमहल" था, जिसमें भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ था। भगवान ऋषभदेव के शरीर की ऊँचाई 500 धनुष अर्थात् 3000 फुट मानी गई है।
  16. अयोध्या से ही प्रथम चक्रवर्ती भरत ने षट्खण्ड धरा पर विजय प्राप्त करके राज्य किया था।
  17. अयोध्या में ही दशरथ पुत्र भगवान रामचन्द्र का जन्म हुआ, जिन्होंने अंत में जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर मोक्ष प्राप्त किया। जैन आगम के अनुसार इनका जन्म इक्ष्वाकुवंशी परम्परा में लगभग 9 लाख वर्ष पूर्व हुआ है।
  18. अयोध्या में ही सती सीता ने अपने अखण्ड शील के प्रभाव से अग्नि को सरोवर बनाया और पृथ्वीमती आर्यिका माताजी के पास आर्यिका दीक्षा लेकर 62 वर्षों तक घोर तपस्चर्या करके अंत में समाधिमरणपूर्वक स्वर्ग में प्रतीन्द्र पद प्राप्त किया।
  19. अयोध्या से ही भोगभूमि के उपरांत कर्मभूमि की व्यवस्था प्रारंभ हुई और भगवान ऋषभदेव ने प्रजा को जीवन जीने की कला सिखाई।
  20. अयोध्या में सौधर्म इन्द्र द्वारा सर्वप्रथम मध्य में एक जिनमंदिर और पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर इन चार दिशाओं में एक-एक जिनमंदिर का निर्माण किया गया था।
अयोध्या जैन तीर्थ के जीर्णोद्धारक आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज
जिनालय प्रतिमाएं

चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा में अनेक महापुरुषों ने जैन धर्म की प्रभावना की। इसी परंपरा में पूज्य आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज का जीवन विशिष्ट और प्रेरणादायक रहा। आपने दीक्षा, साधना, संघ-निर्माण और धर्मप्रचार के माध्यम से देशभर में जैन समाज को सशक्त दिशा प्रदान की।

आपका जन्म कर्नाटक क्षेत्र में हुआ और प्रारंभिक जीवन से ही वैराग्य की भावना प्रबल रही। कठोर तप, अध्ययन और संयमपूर्ण जीवन के पश्चात आपने मुनि दीक्षा धारण की तथा समय के साथ आचार्य पद से अलंकृत हुए। आचार्य श्री का प्रवास जीवन अत्यंत सक्रिय रहा, जिसमें उन्होंने अनेक शहरों और तीर्थक्षेत्रों में धर्मजागरण का कार्य किया।

आचार्य श्री के मार्गदर्शन में अनेक शिष्य-शिष्याओं ने दीक्षा ग्रहण की और साधना-पथ पर अग्रसर हुए। उनके सान्निध्य में अयोध्या सहित अनेक तीर्थों में जीर्णोद्धार, मंदिर-विकास और धार्मिक आयोजनों का विस्तार हुआ। अयोध्या तीर्थ के पुनरुत्थान में उनका योगदान इतना व्यापक रहा कि उन्हें इस क्षेत्र का प्रमुख जीर्णोद्धारक माना जाता है।

अयोध्या में प्राचीन जैन परंपरा के संरक्षण हेतु आचार्य श्री ने समाज को संगठित किया, तीर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया और धार्मिक चेतना को नई ऊर्जा दी। उनके प्रेरक कार्यों के परिणामस्वरूप यहां जिनालयों का विस्तार, सांस्कृतिक गतिविधियों का पुनर्जीवन और श्रद्धालुओं के लिए अधिक व्यवस्थित सुविधाएं विकसित हुईं।

आचार्य श्री का साधना स्वरूप
सन् 1994 से अयोध्या तीर्थ विकास हेतु अहर्निश कटिबद्ध
सर्वोच्च जैन साध्वी भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी
गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी

मंदिर निर्माण एवं अयोध्या विकास-इस प्रकार पूज्य माताजी की प्रेरणा से अब अयोध्या विकास का एक नया क्रम चालू हुआ। 13 से 24 फरवरी 1994 तक भगवान ऋषभदेव महामस्तकाभिषेक महोत्सव का राष्ट्रीय स्तरीय आयोजन भारी धूमधाम के साथ सम्पन्न हुआ। पुनः रायगंज स्थित प्रांगण में ही 19 से 23 फरवरी 1994 में तीन चौबीसी जिनमंदिर का निर्माण कर 72 प्रतिमाओं की पंचकल्याणक एवं 15 से 20 फरवरी 1995 में समवसरण जिनमंदिर का निर्माण होकर भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुए। 20 फरवरी 1995 को दोनों जिनमंदिरों के शिखर पर कलशारोहण का कार्यक्रम भी सानंद किया गया।

इसी दौरान सभी भगवन्तों की प्राचीन जन्मस्थली टोंकों पर एवं शासन-प्रशासन के द्वारा विभिन्न शासकीय स्थानों पर भी अनेक जीर्णोद्धार व निर्माण के कार्य सम्पन्न हुए, जिससे जैनधर्म की अद्भुत प्रभावना हुई और समूचे अयोध्या के साथ ही उत्तरप्रदेश व देश में इस बात का संदेश जन-जन तक पहुँचा कि अयोध्या जैन तीर्थंकरों की एवं भगवान ऋषभदेव की भी जन्मभूमि है, जो युगादि तीर्थ के रूप में सर्वमान्य है। साथ ही भगवान ऋषभदेव की इक्ष्वाकुवंशीय परम्परा में ही श्रीरामचंद्र भगवान हुए हैं, इस बात का भी प्रचार-प्रसार सभी दूर हुआ।

पुनः अयोध्या आगमन-पूज्य माताजी का सन् 1995 के उपरांत पुनः 2005 में अयोध्या आगमन हुआ और भव्यता के साथ भगवान ऋषभदेव महामस्तकाभिषेक का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूज्य माताजी ने कमेटी को प्रेरणा दी कि पाँचों जन्मभूमि टोंकों पर प्राचीन चरणों और शिलालेखों से छेड़-छाड़ किए बिना ही सभी टोकों पर सुंदर जिनमंदिरों के निर्माण किये जाना चाहिए। इसके उपरांत सभी टोकों पर क्रमशः विभिन्न वर्षों में सुन्दर जिनमंदिरों के निर्माण और प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भी सानंद सम्पन्न हुई। पुनः पूज्य माताजी का मंगल आगमन अयोध्या में सन् 2019 में हुआ और दिनाँक 10 से 29 मार्च 2019 तक भगवान ऋषभदेव महामस्तकाभिषेक महोत्सव सम्पन्न किया गया। पुनः टिकैतनगर चातुर्मास के उपरांत पूज्य माताजी का आगमन अयोध्या में दिनाँक 4 नवम्बर 2019 को हुआ और इस अवसर पर दिनाँक 6 नवम्बर 2019 को पूज्य माताजी के सान्निध्य में यहाँ भगवान ऋषभदेव के मोक्षप्राप्त 101 पुत्रों का जिनमंदिर बनाने का शिलान्यास हुआ। साथ ही तीर्थ पर 31 फुट उत्तुंग भगवान भरत स्वामी की खड्‌गासन प्रतिमा विराजमान करने हेतु भी मंदिर का शिलान्यास किया गया।

पुनः पूज्य माताजी का मंगल आगमन इस अयोध्या तीर्थ पर 31 दिसम्बर 2022 को हुआ। 90 वर्ष की आयु में केवल इस शाश्वत अयोध्या तीर्थक्षेत्र की वंदना और इसके विश्वव्यापी प्रचार-प्रसार व विकास का लक्ष्य लेकर दिनाँक 1 नवम्बर 2022 को पूज्य माताजी ने जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर तीर्थ से 650 किमी. के लिए पदविहार यात्रा करके अयोध्या आगमन किया। जिसके उपरांत यहाँ स्थित बड़ी मूर्ति-जैन मंदिर परिसर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुसज्जित करके तीस चौबीसी की 720 जिनप्रतिमाओं का एवं 31 फुट उत्तुंग भगवान भरत प्रतिमा का ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव वैशाख शु. दशमी से पूर्णिमा अर्थात् दिनाँक 30 अप्रैल से 5 मई 2023 को सम्पन्न हुआ। पश्चात् 7 मई 2023 तक महामस्तकाभिषेक हुआ।

इसके उपरांत पुनः द्वितीय चरण में फाल्गुन शु. तृतीया से सप्तमी, 2 मार्च से 6 मार्च 2025 में इस तीर्थ पर नवनिर्मित तीनलोक रचना के 727 भगवान एवं अन्य 1008 जिनप्रतिमाओं का राष्ट्रीय स्तरीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुआ। इस प्रकार आज यह शाश्वत तीर्थ, भगवान ऋषभदेव आदि पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या, पूज्य माताजी की प्रेरणा-साधना एवं महती दूरदर्शिता से विश्व के क्षितिज पर लगातार अपनी आभा बिखेर रहा है और जैनत्व के अति प्राचीन इतिहास और इसकी अनादिनिधनता का एक लौहस्तंभ-स्वर्णिम स्मारक बनकर हजारों सदियों के लिए चिरस्थायी बना हुआ है।