भगवान ऋषभदेव आदि ५ तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या में आपका हार्दिक अभिनंदन
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भगवान ऋषभदेव जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र रायगंज, बड़ी मूर्ति
आज से करोड़ों वर्ष पूर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म भारतवर्ष के उत्तरप्रदेश की अयोध्यानगरी के महाराजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी की पवित्र कुक्षि से चैत्र कृष्णा नवमी को हुआ। इक्ष्वाकुवंशी, तप्त स्वर्ण सदृश, बैल चिन्ह से युक्त उन तीर्थंकर भगवान के शरीर की अवगाहना दो हजार हाथ एवं आयु चौरासी लाख पूर्व वर्ष की थी। भगवान ऋषभदेव ने कर्मभूमि की आदि में प्रजा को असि, मसि आदि प्रक्रियाओं द्वारा जीवन जीने की कला सिखाई थी।
सम्पूर्ण विद्याओं और कलाओं के जनक भगवान ऋषभदेव ने चैत्र कृष्णा नवमी की शुभ तिथि में प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर घोर तपश्चरण किया पुनः मुनिपरम्परा को जीवन्त करने हेतु आहारार्थ निकले। 1 वर्ष 39 दिन के पश्चात् उनका प्रथम आहार हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस के यहाँ इक्षुरस का हुआ। प्रयाग के पुरिमतालपुर उद्यान में वटवृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्णा ग्यारस को उन्हें दिव्यकेवलज्ञान की प्राप्ति हुई, उनके समवसरण में श्रीवृषभसेन आदि 84 गणधर, 84 हजार मुनि, गणिनी ब्राह्मी आर्यिका सहित 350000 आर्यिकाएं, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएँ थे।
उनके जिनशासन यक्ष गोमुख देव एवं यक्षी चक्रेश्वरी देवी हैं। आयु के अंत में उन्होंने माघ कृष्णा चौदस को कैलाशपर्वत से मोक्ष प्राप्त किया। अनंतर सौधर्मेन्द्र ने आकर महाराजा नाभिराय से परामर्श कर असंख्यात देव परिवार के साथ मिलकर प्रभु ऋषभदेव का राज्याभिषेक करके विश्व के प्रथम राजा के पद पर प्रतिष्ठित किया
आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज का ध्यान शाश्वत तीर्य अयोध्या की ओर भी रहा और उन्होंने सन् 1952 में अयोध्या के कटरा स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में भगवान आदिनाथ-भरत-बाहुबली प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भी सम्पन्न कराई। पुनः आपकी ही प्रेरणा से सन् 1965 में अयोध्या के रायगंज स्थित एक विशाल सात एकड़ प्रागण वाला रियासती बगीचा क्रय किया गया और वहाँ जिनमंदिर बनवाकर 31 फुट ऊँचे भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा भी विराजमान की गई। सन् 1965 का यह पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव भी अयोध्या और समस्त अवध प्रान्त का ऐतिहासिक कार्य रहा। आज भी यह प्रतिमा जैनत्व की शान बनकर अयोध्या को अनंत तीर्थंकरों की जन्मभूमि होने का गौरव प्रदान करती है। इस प्रकार अनेक महान कार्यों के साथ ही आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज का अयोध्या के जीर्णोद्धार एवं विकास में योगदान रहा है।
तीन लोक जिनालय
लोक के तीन भाग - अधोलोक, मध्यलोक, ऊर्ध्वलोक के भेद से यह लोक तीन भागों में विभक्त है। बीच में त्रसनाड़ी है उसी में सारी रचना है।
अधोलोक -अधोलोक में नीचे निगोद व (7) सात नरक हैं। पुनः दो भागों में देवों के महल हैं। जिनमें भवनवासी देवों के सात करोड़ बहत्तर लाख जिनमंदिर हैं तथा व्यंतरदेवों के असंख्यातों महलों में एक-एक ऐसे असंख्यात जिनमंदिर हैं।
मध्यलोक -बीच में असंख्यातों द्वीप, समुद्र हैं। प्रथम द्वीप का नाम जंबूद्वीप हैं। इसमें भरत आदि 7 क्षेत्र हैं। द्वीप है। प्रथम जंबूद्वीप, द्वितीय धातकीखंड द्वीप, तृतीय पुष्करार्ध- जंबूद्वीप गोल थाली के समान आकार वाला है। इसे घेरकर लवण समुद्र है। पुनः इसे घेरकर धातकीखंड द्वीप है। वह दो भागों में विभक्त है- पूर्व धातकीखंड एवं पश्चिम धातकी-खंड। पुनः इसे घेरकर कालोदधि समुद्र है। इसे घेरकर पुष्कररार्ध द्वीप है। इसके बीच में चूड़ी के समान आकार वाला मानुषोत्तर पर्वत है। यहीं तक मनुष्यों की सीमा है। अतः ढाईद्वीप तक मनुष्य होते हैं। यहाँ तीन लोक में मध्यलोक में ढाईद्वीप तक ही अति संक्षिप्त रचना नाम मात्र में दिखायी गई है।
ऊर्ध्वलोक -इस मध्यलोक के ऊपर ऊर्ध्वलोक है। इसमें 16 स्वर्ग सौधर्म-ईशान आदि हैं। नवग्रैवेयक, नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर हैं। इनमें देवगण ही रहते हैं। 16 स्वर्गों तक देव-देवियाँ हैं, आगे मात्र देवगण - अहमिन्द्र नाम से होते हैं।
सिद्धशिला -इसके ऊपर सिद्धशिला है। इस सिद्धशिला से कुछ ऊपर जाकर अनंतानंत सिद्ध भगवान विराजमान हैं। जो मनुष्य दिगम्बर मुद्रा धारण कर जैनमुनि बनकर तपश्चरण करके अपने सभी आठ प्रकार के कर्मों को नष्ट कर देते हैं- अपनी आत्मा से पृथक् कर देते हैं वे ही सिद्ध कहलाते हैं। ये लोक के अंदर ही हैं, लोक के बाहर नहीं है।
नमूँ त्रिकालिक सिद्ध सब, पाऊँ सौख्य अनंत ।।तीनलोक के शाश्वत-अकृत्रिम जैन मन्दिर - अधोलोक के सात करोड़ बहत्तर लाख जिनमंदिर हैं। मध्यलोक के चार सौ अट्ठावन एवं ऊर्ध्वलोक के चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस हैं। ये सब मिलकर आठ करोड़, छप्पन लाख, सत्तानवें हजार, चार सौ इक्यासी हैं। मध्यलोक के
आराध्य श्री ऋषभदेव जी के 101 पुत्र जिनालय
श्री ऋषभदेव के भरत चक्रवर्ती, बाहुबली, ऋषभसेन, अनंतविजय, अनंतवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि एक सौ एक (101) पुत्र थे। (सन्दर्भ - महापुराण) सभी ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर सिद्धपद प्राप्त किया है। इन सभी सिद्ध भगवन्तों की प्रतिमाएँ अयोध्या में विराजमान हैं।
चक्रवर्ती भगवान भरत जिनालय
हम सब जानते हैं कि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं, जिनके प्रथम पुत्र का नाम "भरत" था। आगे चलकर इन्हीं भरत के राजमहल में चक्ररत्न उत्पन्न होने से इन्होंने षट्खण्ड की धरा पर विजय प्राप्त करके चक्रवर्ती का पद प्राप्त किया था। पश्चात् आपने भरत क्षेत्र के 1 आर्यखण्ड एवं 5 म्लेच्छ खण्ड-इस प्रकार पूरे छह खण्ड की प्रजा पर शासन करके समस्त राज्य की प्रजा में सुख-शांति व ऐश्वर्य का वातावरण स्थापित किया था। अतः इन्हें चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से इस सम्पूर्ण वसुन्धरा पर जाना जाता था। चक्रवर्ती सम्राट भरत इस युग के एक मात्र ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने किसी समय वैराग्य को प्राप्त करके समस्त वसुन्धरा के इतने वैभवशाली राजपाट को तृणवत् त्याग कर दिया था। पश्चात् केशलोच क्रियापूर्वक जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके मात्र अंतर्मुहूर्त अर्थात् 48 मिनट के काल में इतनी गहन आत्मसाधना की कि वे केवलज्ञान को प्राप्त हो गये और अंततोगत्वा उनकी आत्मा भगवानस्वरूप परम सिद्धपरमेष्ठी पद को प्राप्त हुई।
भरत स्वामी ऐसे भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ है, यह बात हमारे प्राचीन जैन आगम ग्रंथों में तथा इसके साथ ही अनेकों वैदिक पुराणों में भी उल्लेखित मिलती पूज्य माताजी के मन में इस वात को जन-जन तक पहुँचाने का भाव रहा। इसी उद्देश्य को लेकर अयोध्या के बड़ी मूर्ति दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज परिसर में भी 31 फुट उत्तुंग भगवान भरत स्वामी की खड्गासन प्रतिमा विराजमान की गयी है ।
सर्वतोभद्र महल (निर्माणाधीन)
तृतीय काल के अंतिम भाग में 14 कुलकर हुये हैं। उनमें से तेरहवें कुलकर प्रसेनजित थे। प्रसेनजित का विवाह प्रधान कुल की कन्या से संपन्न हुआ। प्रसेनजित कुलकर ने नाभिराय को जन्म दिया। इंद्र ने राजा नाभिराय का विवाह मरुदेवी कन्या के साथ सम्पन्न किया।
महापुराण में वर्णन है-
तस्यासीत् मरुदेवीति, देवी देवीव सा शची।
रूपलावण्यकांतिश्रीमतिद्युतिविभूतिभिः ।।12।।
( नाभिराय के मरुदेवी नाम की रानी थी, जो कि अपने रूप, सौंदर्य, कांति, शोभा, बुद्धि. द्युति और विभूति आदि गुणों से इंद्राणी देवी के गुणों के समान थीं। )
तस्याः कित समुद्वाहे, सुरराजेन चोदिता।( उन मरुदेवी के विवाह के समय इंद्र के द्वारा प्रेरित हुये उत्तम देवों ने बहुत ही विभूति के साथ उनका विवाहोत्सव सम्पन किया था। )
सुरोत्तमा महाभूत्या, चकुः कल्याणकौतुकम्' ।।59।।
उस समय दक्षिण भरतक्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे, परन्तु राजा नाभिराज का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथिवी निर्मित प्रासाद - महल बन गया था। राजा नाभिराज के उस प्रासाद का नाम 'सर्वतोभद्र' था। उसके खंभे स्वर्णमयी थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं, वह पुखराज, मूंगा तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासी खन- मंजिल से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलंकृत था।
दैनिक पूजा एवं आरती क्रम
- मंदिर दर्शन प्रारम्भ प्रातः 5 बजे से
- अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजा-विधान
- सायंकालीन आरती, भजन, प्रवचन और प्रश्न मंच
यात्रियों के लिए निर्देश
- समूह यात्रा से पहले कार्यालय में पंजीकरण करें
- विशेष पूजा हेतु समय निर्धारण आवश्यक है
- तीर्थ परिसर में स्वच्छता और मर्यादा का पालन करें
- दान सहयोग केवल अधिकृत माध्यम से करें
प्रमुख तीर्थ टोंक
अयोध्या क्षेत्र की प्रमुख जन्मभूमि टोंकों का संक्षिप्त परिचय
श्री ऋषभदेव भगवान जन्मभूमि टोंक
अयोध्या तीर्थ की मूल आध्यात्मिक धुरी, जहां हजारों श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शन हेतु पधारते हैं।
विस्तार से देखें
श्री अजितनाथ भगवान जन्मभूमि टोंक
धार्मिक अनुशासन और साधना वातावरण के लिए विशेष रूप से विख्यात तीर्थ स्थल।
विस्तार से देखें
श्री अभिनंदन भगवान जन्मभूमि टोंक
ऐतिहासिक परंपरा और भावपूर्ण जिनपूजन व्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र।
विस्तार से देखें
श्री सुमतिनाथ भगवान जन्मभूमि टोंक
धार्मिक अनुशासन और साधना वातावरण के लिए विशेष रूप से विख्यात तीर्थ स्थल।
विस्तार से देखें
श्री अनन्तनाथ भगवान जन्मभूमि टोंक
ऐतिहासिक परंपरा और भावपूर्ण जिनपूजन व्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र।
विस्तार से देखेंअन्य दर्शनीय स्थान
अयोध्या क्षेत्र के निकटवर्ती अन्य दर्शनीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर
श्री धर्मनाथ दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र, रतनपुरी
श्री धर्मनाथ दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र रतनपुरी ग्राम - रतनपुरी पोस्ट - रोनाही जिला - फैजाबाद (उत्तर प्रदेश), अयोध्या तीर्थ की मूल आध्यात्मिक धुरी, जहां हजारों श्रद्धालु प्रतिवर्ष दर्शन हेतु पधारते हैं।
विस्तार से देखेंभगवान ऋषभदेव राजकीय उद्यान राजघाट, अयोध्या
अयोध्या में सरयू नदी के तट पर स्थित भगवान ऋषभदेव राजकीय उद्यान (राजघाट) एक शांतिपूर्ण और हरा-भरा पार्क है, जो मुख्य रूप से प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 21-22 फीट ऊँची प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। 1989 में स्थापित यह उद्यान आध्यात्मिक शांति और प्रकृति के संगम के साथ योग व टहलने के लिए एक प्रमुख स्थान है।
विस्तार से देखेंज्ञानमती माताजी की जन्मभूमि, टिकैतनगर
यहाँ बहुत ही प्राचीन श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर है तथा साथ ही नवग्रह जैन मंदिर भी है।