बड़ी मूर्ति तीर्थ परिसर के जिनालय
भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर बड़ी मूर्ति परिसर, अयोध्या में आपका हार्दिक अभिनंदन
बड़ी मूर्ति तीर्थ परिसर के जिनालय
अयोध्या क्षेत्र की प्रमुख जन्मभूमि टोंकों का संक्षिप्त परिचय
तीन चौबीसी मंदिर
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समवशरण जिन मंदिर
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चक्रवर्ती भगवान भरत मंदिर
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तीन लोक मंदिर
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श्री ऋषभदेव जी के 101 पुत्र - सिद्ध परमेष्ठी मंदिर
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अयोध्या क्षेत्र के निकटवर्ती अन्य दर्शनीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर
तीर्थ का मुख्य प्रवेश द्वार
तृतीय काल के अंतिम भाग में 14 कुलकर हुये हैं। उनमें से तेरहवें कुलकर प्रसेनजित थे। प्रसेनजित का विवाह प्रधान कुल की कन्या से संपन्न हुआ। प्रसेनजित कुलकर ने नाभिराय को जन्म दिया। इंद्र ने राजा नाभिराय का विवाह मरुदेवी कन्या के साथ सम्पन्न किया।
महापुराण में वर्णन है-
तस्यासीत् मरुदेवीति, देवी देवीव सा शची।
रूपलावण्यकांतिश्रीमतिद्युतिविभूतिभिः ।।12।।
( नाभिराय के मरुदेवी नाम की रानी थी, जो कि अपने रूप, सौंदर्य, कांति, शोभा, बुद्धि. द्युति और विभूति आदि गुणों से इंद्राणी देवी के गुणों के समान थीं। )
तस्याः कित समुद्वाहे, सुरराजेन चोदिता।( उन मरुदेवी के विवाह के समय इंद्र के द्वारा प्रेरित हुये उत्तम देवों ने बहुत ही विभूति के साथ उनका विवाहोत्सव सम्पन किया था। ) उस समय दक्षिण भरतक्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे, परन्तु राजा नाभिराज का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथिवी निर्मित प्रासाद - महल बन गया था। राजा नाभिराज के उस प्रासाद का नाम 'सर्वतोभद्र' था। उसके खंभे स्वर्णमयी थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं, वह पुखराज, मूंगा तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासी खन- मंजिल से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलंकृत था।
सुरोत्तमा महाभूत्या, चकुः कल्याणकौतुकम् ।।59।।
सर्वतोभद्र महल (निर्माणाधीन)
तृतीय काल के अंतिम भाग में 14 कुलकर हुये हैं। उनमें से तेरहवें कुलकर प्रसेनजित थे। प्रसेनजित का विवाह प्रधान कुल की कन्या से संपन्न हुआ। प्रसेनजित कुलकर ने नाभिराय को जन्म दिया। इंद्र ने राजा नाभिराय का विवाह मरुदेवी कन्या के साथ सम्पन्न किया।
महापुराण में वर्णन है-
तस्यासीत् मरुदेवीति, देवी देवीव सा शची।
रूपलावण्यकांतिश्रीमतिद्युतिविभूतिभिः ।।12।।
( नाभिराय के मरुदेवी नाम की रानी थी, जो कि अपने रूप, सौंदर्य, कांति, शोभा, बुद्धि. द्युति और विभूति आदि गुणों से इंद्राणी देवी के गुणों के समान थीं। )
तस्याः कित समुद्वाहे, सुरराजेन चोदिता।( उन मरुदेवी के विवाह के समय इंद्र के द्वारा प्रेरित हुये उत्तम देवों ने बहुत ही विभूति के साथ उनका विवाहोत्सव सम्पन किया था। ) उस समय दक्षिण भरतक्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे, परन्तु राजा नाभिराज का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथिवी निर्मित प्रासाद - महल बन गया था। राजा नाभिराज के उस प्रासाद का नाम 'सर्वतोभद्र' था। उसके खंभे स्वर्णमयी थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं, वह पुखराज, मूंगा तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासी खन- मंजिल से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलंकृत था।
सुरोत्तमा महाभूत्या, चकुः कल्याणकौतुकम् ।।59।।