श्री दिगंबर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी, अयोध्या
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अयोध्या जैन तीर्थ लोगो

बड़ी मूर्ति तीर्थ परिसर के जिनालय

भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर बड़ी मूर्ति परिसर, अयोध्या में आपका हार्दिक अभिनंदन

बड़ी मूर्ति तीर्थ परिसर के जिनालय

अयोध्या क्षेत्र की प्रमुख जिनालयों का संक्षिप्त परिचय

अन्य दर्शनीय स्थान

अयोध्या क्षेत्र के निकटवर्ती अन्य दर्शनीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर

तीर्थ का मुख्य प्रवेश द्वार

तीर्थ का मुख्य प्रवेश द्वार

रायगंज बड़ी मूर्ति मंदिर का मुख्य द्वार अपनी भव्यता, प्राचीन शैली और उत्कृष्ट कारीगरी के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यह द्वार लाल पत्थरों से निर्मित है और इसमें अत्यंत सुंदर तथा आकर्षक हस्तनिर्मित नक्काशी की गई है, जो इसे एक अद्वितीय और दर्शनीय स्वरूप प्रदान करती है। इस द्वार की बनावट में प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिससे इसमें एक विशेष एंशिएंट (प्राचीन) टच का अनुभव होता है।

मुख्य द्वार पर विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृश्य बड़ी सुंदरता से उकेरे गए हैं। इसमें देवताओं की आकृतियाँ, दुण्डुभी बजाते हुए दिव्य पात्र, रथ यात्रा के दृश्य तथा अन्य पारंपरिक धार्मिक प्रतीक अत्यंत बारीकी से बनाए गए हैं। यह समस्त नक्काशी मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा और प्राचीन कला की समृद्ध परंपरा को दर्शाती है।

द्वार के दोनों ओर विशाल और सुसज्जित हाथियों की प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं, जो इसकी भव्यता को और भी बढ़ाती हैं। ये हाथी शक्ति, गौरव और संरक्षण के प्रतीक माने जाते हैं तथा मंदिर के प्रवेश द्वार को अत्यंत प्रभावशाली स्वरूप प्रदान करते हैं।

मुख्य द्वार के ऊपर भगवान ऋषभदेव की सुंदर प्रतिमा भी स्थापित है, जो अत्यंत मनोहारी और दिव्य प्रतीत होती है। इस प्रतिमा के दर्शन से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और भक्ति का अनुभव होता है। संपूर्ण रूप से यह मुख्य द्वार न केवल मंदिर की पहचान है, बल्कि प्राचीन कला, आस्था और स्थापत्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी है।

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सर्वतोभद्र महल (निर्माणाधीन)

तृतीय काल के अंतिम भाग में 14 कुलकर हुये हैं। उनमें से तेरहवें कुलकर प्रसेनजित थे। प्रसेनजित का विवाह प्रधान कुल की कन्या से संपन्न हुआ। प्रसेनजित कुलकर ने नाभिराय को जन्म दिया। इंद्र ने राजा नाभिराय का विवाह मरुदेवी कन्या के साथ सम्पन्न किया।

उस समय दक्षिण भरतक्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे, परन्तु राजा नाभिराज का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथिवी निर्मित प्रासाद - महल बन गया था। राजा नाभिराज के उस प्रासाद का नाम 'सर्वतोभद्र' था। उसके खंभे स्वर्णमयी थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं, वह पुखराज, मूंगा तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासी खन- मंजिल से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलंकृत था।

हरिवंशपुराण में लिखा है-

सर्वतोभद्रसंज्ञोऽसौ, प्रासादः सर्वतो मतः।
सैकाशीतिपदः शाल वाप्युद्यानाद्यलंकृतः ।।

(हरिवंश पु. सर्ग 8)

जब चौदहवें मनु नाभिराज थे, उस समय दक्षिण भरतक्षेत्र में कल्पवृक्षरूप प्रासाद भवन अन्यत्र नष्ट हो गये थे, परन्तु राजा नाभिराज का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था, वही पृथ्वी निर्मित प्रासाद बन गया था। राजा नाभिराज के उस प्रासाद का नाम 'सर्वतोभद्र' था। इसके स्वर्णमय खंभे थे, मणियों से बनी दीवालें थीं, यह पुखराज, मूंगा, मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था और इक्यासी खण्ड का था तथा परकोटा बावड़ी, बगीचे आदि से अलंकृत था। वह अधिष्ठाता नाभिराज के प्रभाव से अकेला ही अनेक कल्पवृक्षों से घिरा हुआ पृथ्वी के मध्य अपने स्थान पर अधिष्ठित था।