चक्रवर्ती भगवान भरत जिनालय
हम सब जानते हैं कि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं, जिनके प्रथम पुत्र का नाम "भरत" था। आगे चलकर इन्हीं भरत के राजमहल में चक्ररत्न उत्पन्न होने से इन्होंने षट्खण्ड की धरा पर विजय प्राप्त करके चक्रवर्ती का पद प्राप्त किया था। पश्चात् आपने भरत क्षेत्र के 1 आर्यखण्ड एवं 5 म्लेच्छ खण्ड-इस प्रकार पूरे छह खण्ड की प्रजा पर शासन करके समस्त राज्य की प्रजा में सुख-शांति व ऐश्वर्य का वातावरण स्थापित किया था। अतः इन्हें चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से इस सम्पूर्ण वसुन्धरा पर जाना जाता था। चक्रवर्ती सम्राट भरत इस युग के एक मात्र ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने किसी समय वैराग्य को प्राप्त करके समस्त वसुन्धरा के इतने वैभवशाली राजपाट को तृणवत् त्याग कर दिया था। पश्चात् केशलोच क्रियापूर्वक जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके मात्र अंतर्मुहूर्त अर्थात् 48 मिनट के काल में इतनी गहन आत्मसाधना की कि वे केवलज्ञान को प्राप्त हो गये और अंततोगत्वा उनकी आत्मा भगवानस्वरूप परम सिद्धपरमेष्ठी पद को प्राप्त हुई।
भरत स्वामी ऐसे भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत हुआ है, यह बात हमारे प्राचीन जैन आगम ग्रंथों में तथा इसके साथ ही अनेकों वैदिक पुराणों में भी उल्लेखित मिलती पूज्य माताजी के मन में इस वात को जन-जन तक पहुँचाने का भाव रहा। इसी उद्देश्य को लेकर अयोध्या के बड़ी मूर्ति दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज परिसर में भी 31 फुट उत्तुंग भगवान भरत स्वामी की खड्गासन प्रतिमा विराजमान की गयी है ।