चक्रवर्ती भगवान भरत मंदिर
यह पावन तीर्थ स्थल श्रद्धालुओं के लिए दर्शन, पूजा और साधना का केंद्र है।
History | इतिहास
वीर निर्वाण के लगभग सौ वर्ष बाद मगध नरेश नंदिवर्धन ने अयोध्या में मणिपर्वत नामक उत्तुंग जैन स्तूप बनवाया था, जो आज मणि पर्वत टीला के नाम से प्रसिद्ध है। मौर्य सम्राट संप्रति और वीर विक्रमादित्य ने इस क्षेत्र के पुराने जिनमंदिरों का जीर्णोद्धार एवं नवीन मंदिरों का निर्माण कराया था।
गुजरात नरेश कुमारपाल चौलुक्य (सोलंकी) ने भी यहाँ जिनमंदिर बनवाये थे।
प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जन्मस्थली के रूप में एक टोंक ला. केसरी सिंह के समय से पूर्व ही विद्यमान थी और उन्होंने 1824 ई. में इसका जीर्णोद्धार कराया था, पुनः 1899 ई. में लखनऊ के पंचों ने तथा 1956 ई. में ला. जम्बू प्रसाद जैन, गोटे वाले-लखनऊ ने जीर्णोद्धार कराया था। यह टोंक स्वर्गद्वार मोहल्ले में स्थित है।
इस प्रकार सन् 2011 में भी अयोध्या नगरी में एक बार पुनः विकास का बिगुल बजा था, जब स्वर्गद्वार मोहल्ले में स्थित प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की प्राचीन जन्मस्थली टोंक का ऐतिहासिक विकास सम्पन्न हुआ था। यहाँ अत्यन्त छोटी जगह होने के उपरांत भी विशाल जिनमंदिर का निर्माण बड़े चमत्कारिक ढंग से सम्पन्न हुआ और पहली मंजिल पर भगवान की सुन्दर वेदीका निर्मित करके सवा 4 फुट ऊँची भगवान ऋषभदेव की श्वेत पाषाण वाली पद्मासन प्रतिमा विराजमान की गई। इस प्रथम टोंक का जीर्णोद्धार एवं विकास श्री कैलाशचंद जैन सर्राफ (टिकैतनगर वाले), लखनऊ परिवार द्वारा सम्पन्न कराया गया और माघ शु. 11 से फाल्गुन कृ. 3 अर्थात् दिनाँक 14 से 20 फरवरी 2011 तक इस जिनमंदिर की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न की गई, जिसका सीधा प्रसारण पारस चैनल के माध्यम से पूरे देश-विदेश में प्रसारित हुआ था।