आराध्य श्री ऋषभदेव जी के 101 पुत्र जिनालय
युग की आदि में इसी अयोध्या में जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ था। भगवान ऋषभदेव की 2 रानियाँ थी, जिनसे भरत-बाहुबली आदि 101 पुत्र एवं ब्राह्मी व सुन्दरी 2 पुत्रियाँ हुई। पुत्रों में प्रथम पुत्र चक्रवर्ती भरत हुए हैं, जिनके नाम से इस देश का नाम भारत है। इन सभी 101 पुत्रों ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त कर लिया, जिससे सिध्द परमेष्ठी भगवान बन गये । इसी प्राचीन इतिहास को बताने के लिए इस मंदिर में 101 भगवान की प्रतिमाएं विराजमान की गयी हैं। इन 101 भगवान के दर्शन करने से आपकी आत्मा में भी विशुध्दि की प्राप्ति हो, यही मंगल भावना है।
ऋषभदेव के श्री भरत आदि 101 मोक्ष प्राप्त पुत्रों की वंदना
ऋषभदेव के पुत्र सब, भरत आदि शत एक।
दीक्षा ले शिवपथ लिया, नमूँ नमूँ शिर टेक।।1।।
श्री ऋषभदेव के भरत चक्रवर्ती, बाहुबली, ऋषभसेन, अनंतविजय, अनंतवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि एक सौ एक (101) पुत्र थे। (सन्दर्भ - महापुराण) सभी ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर सिद्धपद प्राप्त किया है। इन सभी सिद्ध भगवन्तों की प्रतिमाएँ अयोध्या में विराजमान हैं।
भगवान् ऋषभदेव के पुत्र राजा भरत चक्रवर्ती की लक्ष्मी को प्राप्त हुए थे और उन्हीं के नाम से यह क्षेत्र संसार में भरत क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ था।।59।।
भगवान् ऋषभदेव के सौ पुत्र थे जो एक से एक बढ़कर तेज और कान्ति से सहित थे तथा जो अन्त में श्रमणपद- मुनिपद धारण कर परमपद -निर्वाणधाम को प्राप्त हुए थे।।60।।
उन सौ पुत्रों के बीच भरत चक्रवर्ती प्रथम पुत्र था जो कि सज्जनों के समूह से सेवित अयोध्या नाम की सुन्दर नगरी में रहते थे।।
भरत को एक दिन प्रभु पिता को केवलज्ञान, चक्ररत्न की उत्पत्ति और पुत्ररत्न की प्राप्ति एक साथ तीन समाचार मिले, तब उन्होंने प्रभु के समवसरण में दर्शन कर मुख्य श्रोता का पद प्राप्त किया है। पुनः चक्ररत्न की पूजा आदि करके पुत्र जन्मोत्सव मनाया। अनंतर चक्ररत्न को आगे कर छह खण्ड पर दिग्विजय किया है। अनंतर किसी समय दीक्षा लेते ही तत्क्षण केवलज्ञान प्राप्त कर लिया है। पुनः मोक्षधाम को प्राप्त हुए हैं। इन ऋषभदेव के पुत्र 'भरत' के नाम से देश का नाम भारत पड़ा है। ऐसा वर्णन जैन व जैनेतर, वैदिक ग्रंथों में आया है।)