तीन चौबीसी जिन प्रतिमा प्रतिष्ठा की प्रशस्ति -
ॐ ह्मीं श्री त्रेकालिकचतुर्विंशतिती र्थकंरेभ्यो नमः
मध्यलोक के प्रथम जंबूद्वीप में मेरु के दक्षिण भाग में भरतक्षेत्र के आर्यखंड में अनंतानंत तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या नगरी है। यहाँ रायगंज में ऋषभदेव जिनमंदिर के दक्षिण भाग में तीनचौबीसी मंदिर का निर्माण हुआ है। भगवान महावीरस्वामी के शासन में कुंदकुंदाम्नाय में इस बीसवीं शताब्दी में चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी प्रथम आचार्य हुये हैं। इनके प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागरजी की शिष्या गणिनी आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के सदुपदेश से ससंघ आर्यिका श्री चंदनामतीजी, क्षुल्लक श्री मोतीसागरजी, क्षुल्लिका श्री श्रद्धामतीजी, बह्मचारी रवीन्द्र कुमार, ब्र. कु. आस्था, ब्र. कु. बीना सहित माताजी के सानिध्य में वीर नि.सं. 2520 माघ शु. 12 को सं. सूरि ब्र.श्री सूरजमलजी प्रतिष्ठाचार्य द्वारा त्रेकालिक बहत्तर जिन प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा संपन्न हुई है।
अयोध्या में यहाँ जिनमंदिर में निर्मित सुंदर कमल के दलों पर श्री निर्वाणनाथ आदि भूतकालीन चौबीस तीर्थकर, श्री ऋषभदेव आदि वर्तमान कालीन चौबीस तीर्थंकर और श्री महापद्मनाथ आदि भविष्यकालीन चौबीस तीर्थकर विराजमान हैं। इन त्रैकालिक तीर्थंकरों को त्रिकरणशुद्धिपूर्वक तीनों संध्या कालों में अनंतबार नमस्कार हो।