तीन लोक जिनालय
लोक के तीन भाग - अधोलोक, मध्यलोक, ऊर्ध्वलोक के भेद से यह लोक तीन भागों में विभक्त है। बीच में त्रसनाड़ी है उसी में सारी रचना है।
अधोलोक -अधोलोक में नीचे निगोद व (7) सात नरक हैं। पुनः दो भागों में देवों के महल हैं। जिनमें भवनवासी देवों के सात करोड़ बहत्तर लाख जिनमंदिर हैं तथा व्यंतरदेवों के असंख्यातों महलों में एक-एक ऐसे असंख्यात जिनमंदिर हैं।
मध्यलोक -बीच में असंख्यातों द्वीप, समुद्र हैं। प्रथम द्वीप का नाम जंबूद्वीप हैं। इसमें भरत आदि 7 क्षेत्र हैं। द्वीप है। प्रथम जंबूद्वीप, द्वितीय धातकीखंड द्वीप, तृतीय पुष्करार्ध द्वीप है- जंबूद्वीप गोल थाली के समान आकार वाला है। इसे घेरकर लवण समुद्र है। पुनः इसे घेरकर धातकीखंड द्वीप है। वह दो भागों में विभक्त है- पूर्व धातकीखंड एवं पश्चिम धातकी-खंड। पुनः इसे घेरकर कालोदधि समुद्र है। इसे घेरकर पुष्कररार्ध द्वीप है। इसके बीच में चूड़ी के समान आकार वाला मानुषोत्तर पर्वत है। यहीं तक मनुष्यों की सीमा है। अतः ढाईद्वीप तक मनुष्य होते हैं। यहाँ तीन लोक में मध्यलोक में ढाईद्वीप तक ही अति संक्षिप्त रचना नाम मात्र में दिखायी गई है।
ऊर्ध्वलोक -इस मध्यलोक के ऊपर ऊर्ध्वलोक है। इसमें 16 स्वर्ग सौधर्म-ईशान आदि हैं। नवग्रैवेयक, नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर हैं। इनमें देवगण ही रहते हैं। 16 स्वर्गों तक देव-देवियाँ हैं, आगे मात्र देवगण - अहमिन्द्र नाम से होते हैं।
सिद्धशिला -इसके ऊपर सिद्धशिला है। इस सिद्धशिला से कुछ ऊपर जाकर अनंतानंत सिद्ध भगवान विराजमान हैं। जो मनुष्य दिगम्बर मुद्रा धारण कर जैनमुनि बनकर तपश्चरण करके अपने सभी आठ प्रकार के कर्मों को नष्ट कर देते हैं- अपनी आत्मा से पृथक् कर देते हैं वे ही सिद्ध कहलाते हैं। ये लोक के अंदर ही हैं, लोक के बाहर नहीं है।
तीनलोक के शाश्वत-अकृत्रिम जैन मन्दिर -
अधोलोक के सात करोड़ बहत्तर लाख जिनमंदिर हैं। मध्यलोक के चार सौ अट्ठावन एवं ऊर्ध्वलोक के चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस हैं। ये सब मिलकर आठ करोड़, छप्पन लाख, सत्तानवें हजार, चार सौ इक्यासी हैं।