कथानक के माध्यम से -
तर्ज-तेरी दुनिया से दूर.......
आँसू बन गये वरदान, अयोध्या का हुआ नाम,
वे आँसू याद रखना-2।। टेक. ।।
सुनो भाई-बहनों ! सन् उन्निस सौ तिरानवे में, सोलह जून की
तारीख आई थी... तारीख आई थी....
उस दिन हस्तिनापुर से ज्ञानमती माताजी अयोध्या आई थीं,
अयोध्या आई थीं.....प्रभू के पास आई थीं।
ऋषभदेव टोंक पर, माँ के आंसू गिरे तब,
वे आँसू याद रखना-2 ||1||
अपनी अश्रुधारा से, ऋषभदेव का पद प्रक्षाल कर दिया,
प्रक्षाल कर दिया-मन का भाव कह दिया।
अयोध्या में तब अपने प्रभु के निकट ही।
चौमास कर लिया, चौमास कर लिया।।
दो दो मंदिर के निर्माण, हुए उनके पंचकल्याणक,
वे आँसू याद रखना-2 ||2||
ऋषभदेव प्रभुवर का मस्तकाभिषेक प्रथम बार हो गया,
प्रथम बार हो गया, प्रचार हो गया।
उसके बाद पाँचों तीर्थंकर की टोंकों पर नवनिर्माण हो गया,
निर्माण हो गया, नवनिर्माण हो गया।
माँ की प्रेरणा का फल, भक्ति के हैं ये स्थल।
वे आँसू याद रखना-......||3||
माताजी के ओपेन एण्ड साइलेंट टीयर्स ने कमाल कर दिया,
कमाल कर दिया, इक इतिहास रच दिया।
वह तो रोईं लेकिन अयोध्या जी तीरथ को खुशहाल कर दिया,
खुशहाल कर दिया, और मालामाल कर दिया ।।
वहाँ प्राचीन इतिहास, नया बन गया है आज,
वे आँसू याद रखना-2 ||4||
ऋषभदेव प्रभुवर के मोक्षगामी पुत्रों का इतिहास बताया,
इतिहास बताया, सभी को शास्त्र दिखलाया।
इक सौ एक पुत्रों के जिनमंदिर का शिलान्यास करवाया,
शिलान्यास करवाया, शांतिकेन्द्र बनवाया।।
चक्रवर्ती भरतराज, के मंदिर का शिलान्यास,
वे आँसू याद रखना-2 ||5||
भक्तों ! जब जब तुम भी अयोध्या शाश्वत तीरथ की, वंदना करना,
हाँ वंदना करना, रज को मस्तक पर धरना।।
वर्ल्ड पीस सेंटर में जाकर के क्षण दो क्षण, मन में चिन्तन करना,
मन में चिन्तन करना, माँ का सुमिरन करना।।
"चन्दनामती" यह राज, माँ के आंसू का इतिहास।
वे आँसू याद रखना-2 ||6||