अयोध्या तीर्थ वन्दना
-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी
शाश्वत श्री तीर्थ अयोध्या पहला, तीर्थ कहा जिनशासन में। तीर्थंकर प्रभु जिनराज अनंता-नंत जहाँ पर हैं जनमें।। कई तीर्थंकर प्रभु भूत में जनमें, अरु भविष्य में जन्मेंगे। उनमें ही श्रेणिक राज प्रथम, तीर्थंकर महापद्म होंगे।।1।।
जिनशासन में बस दो ही शाश्वत, तीर्थ कहे हैं युग युग से। इक तीर्थ अयोध्या और दूसरा, है सम्मेदशिखर जग में।। जिन जन्मभूमि निर्वाणभूमि के रूप में दोनों पावन हैं। इन उभय तीर्थ का दर्शन-वंदन, करता सबको पावन है।।2।।
अब चलो चलें प्रभु जन्मभूमि, तीर्थों की प्रथम श्रृंखला में। फिर तीर्थ अयोध्या चलें वहाँ की, पावन रज वन्दना करें।। इस वर्तमान के कृतयुग में, जहाँ पाँच तीर्थंकर जनमें हैं। श्री ऋषभ अजित अभिनन्दन सुमति, अरु अनंतप्रभु जिनवर हैं।।3।।
तीर्थेश प्रथम श्री ऋषभदेव, चक्रीश प्रथम भरतेश हुए। मदनेश बाहुबलि प्रथम-प्रथम, श्री अनंतवीर्य जिनेश हुए।। श्रीवृषभसेन गणधर थे प्रथम, सबके पितु प्रथम जिनेश हुए। ब्राह्मी माँ गणिनी प्रथम सुंदरी, के भी पिता वृषभेश हुए।।4।।
इस तीर्थ अयोध्या में पाँचों, के पाँच टोंक जन्मस्थल हैं। हुण्डावसर्पिणी काल में उनका, दिखता अतिशय बहुविध है।। बीसवीं सदी के अर्ध शतक के बाद पुण्य अवसर आया। जब अवध प्रान्त में देशभूषणा-चार्य गुरु का संघ आया।।5।।
प्रभु ऋषभदेव भरतेश बाहुबलि, मूर्ति उन्होंने पधराई। कुछ वर्ष बाद फिर बड़ी मूर्ति, इकतिस फिट ऊँची बनवाई।। तब तीर्थ अयोध्या ऋषभदेव की, जन्मभूमि बन चमक उठी। जिनशासन की जैनी जनता, प्रभु जयकारा कर झूम उठी।।6।।
प्राचीन काल से तीरथयात्रा, श्रद्धालु जन करते हैं। गुरु उपकारों का सुमिरन कर, टोंकों का वन्दन करते हैं।। अब सुनो और आगे इस तीर्थ, का कैसे और विकास हुआ। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में, दिव्यशक्ति का प्रवास हुआ।।7।।
यह दिव्यशक्ति हैं अवध में जनमीं, गणिनी ज्ञानमती माता। जिनका है जन्म से ही इस तीर्थ, अयोध्या से सीधा नाता ।। उन्निस सौ बानवे सन् में धन-तेरस को ध्यान प्रेरणा मिली। माता को तीर्थ अयोध्या विकसित, करने की तब लगन लगी। 18।।
उनके विहार से तीरथ का, सुन्दर विकास सम्पन्न हुआ। प्रभु ऋषभदेव मस्तकाभिषेक से, सारा भारत धन्य हुआ।। फिर तो इस शाश्वत नगरी का, पूरी दुनिया में नाम हुआ। त्रैकालिक जिनवर मंदिर एवं, समवसरण निर्माण हुआ।।9।।
तीरथ का मुख्य प्रवेशद्वार, अतिसुन्दर तथा मनोहर है। जिन संस्कृति का परिचायक प्रभु, श्री ऋषभदेव का द्वार ये है।। अन्दर प्रवेश करते ही इन्द्र-विमान महल अरु मंदिर हैं। इतिहास अयोध्या का बतलाने, वाली कृतियां सुन्दर हैं।।10।।
जिनमंदिर के दर्शन करके, यात्री जब आगे चलते हैं। यहाँ जन्में प्रभु के जन्मस्थल, टोंकों की वंदना करते हैं।।
श्री ऋषभदेव प्रभु अजितनाथ, अभिनंदन को शत वन्दन है। प्रभु सुमतिनाथ एवं अनंत के, पद में कर लो वंदन है।।11।।
इन पाँचों टोंकों पर विशाल, जिनमंदिर के निर्माण हुए। स्वामी रवीन्द्रकीर्ति के निर्देशन, में पुण्य के धाम बने ।। है छठी टोंक भरतेश बाहुबलि, चक्रवर्ति मदनेश्वर की। सबमें जिनप्रतिमा के संग है, प्राचीन चरणपादुका बनी।।12।।
सन् दो हजार बाइस-तेइस में, पुनः मात प्रेरणा मिली। उनके मंगल सान्निध्य में शाश्वत, तीरथ पर फिर ज्योति जली।। चक्रीश भरत की इकतिस फुट, प्रतिमा का मंदिर बना यहाँ। वृषभेश के इक सौ एक पुत्र, भगवंतों का मंदिर है यहाँ।।13।।
है तीनलोक रचना व तीस, चौबीसी जिनवर का मंदिर। इक महल सर्वतोभद्र अयोध्या, तीरथ का है आकर्षण।। इन सभी अलौकिक निर्माणों से, तीर्थ निराला लगता है। इक बार दर्श जो कर लेता, फिर आने का मन करता है।।14।।
इस तरह अयोध्या में अनेक, जिनमंदिर पुण्य के साधन हैं।
श्रीदेशभूषणाचार्य-ज्ञानमति, माँ की प्रेरणा के फल हैं।।
सरयू नदि के तट पर निर्मित, श्री ऋषभदेव उद्यान बड़ा।
वृषभेश्वर की प्रतिमा से उस, उपवन का है सम्मान बढ़ा।।15।।
जय हो इस तीर्थ अयोध्या की, जय हो यहाँ जनमें प्रभुवर की।
जय हो इक्ष्वाकुवंशी प्रभु एवं, सूर्यवंशि रामचंद्र की।। इस तीर्थ वन्दना से हमको, अपना भवभ्रमण मिटाना है।
"चन्दनामती" निज जन्म को पावन, करके सफल बनाना है।।16।।