श्री दिगंबर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी, अयोध्या
दर्शन/बुकिंग सहायता: +91-8005191351
अयोध्या जैन तीर्थ लोगो

श्री ऋषभदेव के १०१ पुत्र-सिद्धपरमेष्ठी की मंगल आरती

ऑडियो: उपलब्ध नहीं

पूरा लिरिक्स

श्री ऋषभदेव के १०१ पुत्र-सिद्धपरमेष्ठी की मंगल आरती
 
तर्ज-माई रे माई..
 
ऋषभदेव के पुत्र एक सौ, एक सिद्ध भगवन हैं। इनकी मंगल आरति से, हो जाते नष्ट विघन हैं।।
 
बालो जय जय जय, इक सौ एक प्रभू की जय-2।10।।
 
वर्तमान की कर्मभूमि में, हुए प्रथम तीर्थंकर। नाभिराय मरुदेवि के नन्दन, आदिब्रह्म क्षेमंकर ।। जग को जीवन कला सिखाई, ये जगदानन्दन हैं। इनकी मंगल आरति से, हो जाते नष्ट विघन हैं।।
 
बोलो जय जय जय, इक सौ एक प्रभू की जय-2।।1।।
 
यशस्वती व सुनन्दा दो रानी से पुत्र सब जनमें।
 
भरत प्रथम चक्रीश बाहुबलि, कामदेव जी प्रथम थे।। इन दोनों की पुण्य कथाएँ, पढ़ते सब जन जन हैं।। इनकी मंगल आरति से, हो जाते नष्ट विघन हैं।।
 
बोलो जय जय जय, इक सौ एक प्रभू की जय-21।।2।।
 
वृषभसेन नृप दीक्षा लेकर, गुणधर प्रथम कहाए। प्रथम मोक्षगामी मुनिवर, श्री अनन्तवीर्य कहलाए।। पंच प्रथम जो महापुरुष, उन चरणों में वन्दन है। इनकी मंगल आरति से, हो जाते नष्ट विघन हैं।।
 
बोलो जय जय जय, इक सौ एक प्रभू की जय-2।।।3।।
 
विश्वशांतिकारक ये जिनवर, तीर्थ अयोध्या में राजें। पहली बार "चन्दनामति" ये, जिनमंदिर में विराजें।।
 
इनकी चरण धूलि भक्तों, के लिए बने चन्दन हैं। इनकी मंगल आरति से, हो जाते नष्ट विघन हैं।।
 
बोलो जय जय जय, इक सौ एक प्रभू की जय-2।।।3