चौबीस तीर्थंकर वंदना
ऋषभदेव से वीर तक, तीर्थंकर चौबीस ।
नमूँ अनंतों बार मैं, नमूँ नमूँ नत शीश।।1।।
पाँच तीर्थंकर वंदना
ऋषभदेव श्री अजितप्रभु,अभिनंदन भगवान ।
सुमतिनाथ श्री अनंतप्रभु, इन्हें नमूँ धर ध्यान ।।2।।
तीस चौबीसी तीर्थंकर वंदना
तीस चौबीसी तीर्थकर, सभी सात सौ बीस।
नमूँ अनंतों बार मैं, नमूँ नमूँ नत शीश ।।3।।
श्री मुनिसुव्रतनाथ वंदना
तीर्थंकर हैं बीसवें, मुनिसुव्रत भगवान ।
नमूँ अनंतों बार मैं, पाऊँ सौख्य निधान।।4।।
ऋषभदेव के श्री भरत आदि 101 मोक्ष प्राप्त पुत्रों की वंदना
ऋषभदेव के पुत्र सब, भरत आदि शत एक ।
दीक्षा ले शिवपद लिया, नमूँ नमूँ शिर टेक ।।1।।
श्री भरत चक्री के 923 मोक्ष प्राप्त पुत्रों की वंदना
भरत चक्रि के विवर्द्धनादि-सुत नव सौ तेईस।
दीक्षा ले शिवपद लिया, नमूँ नमूँ नत शीश।।1।।
इक्ष्वाकुवंशीय सिद्धपरमेष्ठी वंदना -
शंभु छंद-
ऋषभेश्वर के इक्ष्वाकुवंश में, चौदह लाख प्रमित राजा।
निज सुत को राज्यसौंप दीक्षा, ले सिद्ध बने शिव के राजा ।।
इन अविच्छिन्न सब सिद्धों को, हम मन वच तन से नमते हैं।
हम भी उनके समीप पहुँचें, बस यही याचना करते हैं।।1।।